Sunday, 14 June 2015

वरली

भारत की समृद्ध कला परंपरा में लोक कलाओं का गहरा रंग है। महाराष्ट्र के ठाणे ज़िले में वरली जाति के आदिवासियों का निवास है। इस आदिवासी जाति की कला ही वरली लोक कला के नाम से जानी जाती है। यह जन जाति महाराष्ट्र के दक्षिण से गुजरात की सीमा तक फैली हुई है। वरली लोक कला कितनी पुरानी है यह कहना कठिन है । कला में कहानियों को चित्रित किया गया है इससे अनुमान होता है कि इसका प्रारंभ लिखने पढ़ने की कला से भी पहले हो चुका होगा लेकिन पुरातत्व वेत्ताओं का विश्वास है कि यह कला दसवी शताब्दी में लोकप्रिय हुयी। इस क्षेत्र पर हिन्दू, मुस्लिम,पुर्तगाली और अंग्रज़ी शासकों ने राज्य किया और सभी ने इसे प्रोत्साहित किया। सत्रहवें दशक से इसकी लोकप्रियता का एक नया युग प्रारंभ हुआ जब इनको बाज़ार में लाया गया।
वरली कलाकृतियाँ विवाह के समय विशेष रूप से बनायी जाती थीं। इन्हें शुभ माना जाता था और इसके बिना विवाह को अधूरा समझा जाता था। प्रकृति की प्रेमी यह जनजाति अपना प्रकृतिप्रेम वरली कला में बड़ी गहराई से चित्रित करती हैं। त्रिकोण आकृतियों में ढले आदमी और जानवर, रेखाओं में चित्रित हाथ पाँव तथा ज्यामिति की तरह बिन्दु और रेखाओं से बने इन चित्रों को महिलाएँ घर में मिट्टी की दीवारों पर बनती थीं।
एक विशेषता इस कला में यह होती है कि इसमे सीधी रेखा कहीं नजर नहीं आएगी। बिन्दु से बिन्दु ही जोड़ कर रेखा खींची जाती है। इन्हीं के सहारे आदमी, प्राणी और पेड़-पौधों की सारी गतिविधियाँ प्रदर्शित की जाति है। विवाह, पुरूष, स्त्रीं, बच्चे, पेड़-पौधे, पशुपक्षी और खेत - यहीं विशेष रूप से इन कलाकृतियों के विषय होते है। सामाजिक गतिविधियों को गोबर-मिट्टी से लेपी हुई सतह पर चावल के आटे के पानी में पानी मिला कर बनाए गए घोल से रंगा जाता है। सामाजिक अवसरों के अतिरिक्त दिवाली, होली के उत्सवों पर भी घर की बाहरी दीवारों पर चौक बनाए जाते हैं। यह सारे त्योहार खेतों में कटाई के समय ही आते हैं इसलिए इस समय कला में भी ताजे चावल का आटा इस्तेमाल किया जाता है। रँगने का काम अभी भी पौधों की छोटी-छोटी तीलियों से ही किया जाता है। दो चित्रों में अच्छा खासा अंतर होता है। एक एक चित्र अलग अलग घटनाएँ दर्शाता है।



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