Tuesday, 9 June 2015

‘कलमकारी’

‘कलमकारी’ का मतलब होता है ‘कलम से सजावट करना’।
 यह नाम मुगलों ने दिया था जो कोरोमंडल और गोलकोंडा इलाकों में इस हस्तशिल्प कला के बहुत बड़े संरक्षक थे। तीन हजार साल पुरानी यह हस्तकला आंध्रप्रदेश के दो गांवों श्रीकालहस्ति और मछलीपट्नम में पनपी। इन दोनों गांवों की कलमकारी की अपनी एक अलग खास शैली है। मछलीपट्नम पर तमाम एशिया में फैले मुसलमानों के साथ व्यापारिक रिश्तों का असर था, इसलिए यहां की कलमकारी शैली इस्लामिक खूबसूरती को संवारने का काम कर रही थी। श्रीकालहस्ति शैली पांच पंचभूत मंदिरों में से एक- श्रीकालहस्ति मंदिर, के संरक्षण में फली-फूली। इस वजह से यहां की कलमकारी शैली की प्रेरणा हिंदू पौराणिक कथाएं थीं।
कलमकारी पेंटिंग रेजिस्ट-डाइंग और हैंड प्रिंटिंग की एक जटिल और थकाऊ प्रक्रिया है। कपड़े पर कलमकारी पेंटिंग का काम शुरू करने और पूरा करने के बाद इनका काफी उपचार करना पड़ता है। पहले गाय या बकरी के गोबर में बने घोल से कपड़े पर सफेदी करके कुछ दिनों तक धूप में सुखाना होता है। फिर खमीर-उठे गुड़ और पानी में भिगो कर रखे गए बांस के नुकीले भाग से कपड़े पर रेखाकृतियां खींची जाती हैं। इसके बाद डाइज या रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। कपड़ों पर रंग पक्का करने वाले मॉर्डेंट के रूप में लोहा, टिन, तांबा और दूसरी धातुओं के खनिज लवणों की मदद से फलों, वनस्पतियों, जड़ों और पत्तियों के हिस्सों से रंग निकाल कर डाइज हासिल किए जाते हैं। कुछ रंगों के लिए फिटकिरी और मोम की भी जरूरत पड़ती है। हर रंग लगाने के बाद कलमकारी को धोया जाता है। पूरा होने से पहले कपड़े की तकरीबन बीस बार तक धुलाई होती है। गोबर, बीज, पौधे और मसले हुए फूलों के इस्तेमाल से पेंटिंग में बहुत-से ‘इफेक्ट्स’ लाए जाते हैं।

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